वैक्सीन डिप्लोमेसी से मानवता की पहल

बारबाडोस ने वैक्सीन मैत्री के अंतर्गत भारत निर्मित वैक्सीन प्राप्त की

एएन-32 एयरक्राफ्ट भारतीय वैक्सीन लेकर जैसे ही भूटान की राजधानी थिंपू पहुंचा, द्विपक्षीय संबंधों के इतिहास में एक और स्वर्णिम पृष्ठ जुड़ गया। भारत निर्मित वैक्सीन हासिल करने वाले पहले देश भूटान में भारतीय वैक्सीन की विधि-विधान से पूजा की गई। कुछ इसी तरह लगभग पंद्रह हजार किलोमीटर दूर स्थित ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोललसोनारो ने भारतीय वैक्सीन की खेप मिलते ही, भारत को धन्यवाद देते हुए, इसकी तुलना संजीवनी बुटी से की। जायर ने हनुमान जी की संजीवनी बुटी ले जाते हुए एक तस्वीर भी साझा की। ये कोई सामान्य घटना नहीं है बल्कि द्वपक्षीय संबंधों में मानवता केंद्रित पहल का सबसे जीवंत उदाहरण है। कोरोना संकट के दौर में दुनिया एक बार फिर मानवता केंद्रित भारत के उन प्रयासों का साक्षात्कार कर रही है, जिसमें कूटनीति के केंद्र में हमेशा मानवता आधारित पहल को प्राथमिकता दी गई है। पहले पीपीई किट और एन-95 मास्क और अब पड़ोसी देशों के साथ विश्व की आर्थिक महाशक्तियों को भारत निर्मित वैक्सीन की आपूर्ति वैक्सीन डिप्लोमेसी के रूप में मानवता आधारित कूटनीति की एक और उपलब्धि है।

  • सर्वे सन्तु निरामया: भारत की विदेश नीति का ध्येय वाक्य

दुनिया के अलग-अलग देशों में भेजी जा रही भारतीय वैक्सीन के डिब्बों में ‘सर्वे सन्तु निरामया:’ और भारत सरकार एवं जनता की ओर से उपहार जैसे वाक्य लिखे हैं। इन वाक्यों को कोरोना की जंग में भारत की नीति के ध्येय वाक्य कहा जा सकता है। कोरोना से पैदा विभीषिका का दायरा इतना व्यापक था कि विभिन्न आर्थिक महाशक्तियों और महाद्वीपों की सीमाएं भी असहाय नजर आईं। वैश्विक आपदा के रूप में सामने आए कोरोना संकट से उपजी चुनौतियों के समाधान के लिए स्वाभाविक रूप से दुनिया एक दूसरे की ओर देख रही थी। लेकिन अपनी जनसांख्यिकी और भौगोलिक क्षमताओं के साथ मानवता को लेकर हमारी प्रतिबद्धता ने कोरोना की लड़ाई में भारत को विश्व जगत की उम्मीदों का केंद्र बना दिया।

  • पड़ोसी प्रथम की नीति

ऐसी परिस्थितियों में घरेलू मोर्चे पर टीकाकरण अभियान के साथ अलग-अलग देशों के साथ वैक्सीन मैत्री की इस पहल का दूरगामी असर होगा। वैक्सीन मैत्री की इस पहल में भी हमने पड़ोसी प्रथम की नीति को प्राथमिकता दी है। बांग्लादेश,भूटान, नेपाल, मालदीव समेत दर्जन भर देशों को नि:शुल्क पहुंचाई गई वैक्सीन की खेप को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। इसी क्रम में श्रीलंका, मॉरीशस, अफगानिस्तान, सऊदी अरब, सेशेल्स, ब्राजील, मोरक्को जैसे देशों को भी वैक्सीन की आपूर्ति की जा रही है। यह वह देश हैं जिन्हें हम कोरोना वैक्सीन की खेप किसी बड़े आर्थिक हित की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि वहां की सामाजिक आवश्यकताओं को देखकर कर रहे हैं।

  • भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धि

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित कोरोना की वैक्सीन सिर्फ चिकित्सा जगत की उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह मानवतावादी लक्ष्यों के संधान के लिए ज्ञान की वैश्विक साझेदारी का भी अनुपम उदाहरण है। आज दुनिया का शायद ही कोई ऐसा कोना हो जहां से भारत से भेजे जा रहे मानवता के इस टीके की मांग न हो। अब तक के आंकड़ों के मुताबिक लगभग 92 देशों ने भारत से वैक्सीन की डिमांड की है। दुनिया भर में वैक्सीन उत्पादन के मामले में भारत ग्लोबल हब बनकर उभरा है। कोरोना से निपटने के लिए तैयार कोवैक्सीन और कोवीशील्ड की ही बात करें तो यह दोनों वैक्सीन न सिर्फ सस्ती हैं बल्कि इन्हें स्टोर करना भी आसान हैं। वहीं चीन में तैयार वैक्सीन उठ रहे सवालों के बीच भारतीय वैक्सीन की विश्वसनियता ने इसकी मांग और बढ़ा दी है।

  • आईसीएमआर और भारत बायोटेक के संयुक्त प्रयासों का अभिनंदन

इस उपलब्धि के पीछे कोवैक्सिन तैयार करने वाले भारतीय आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और भारत बायोटक ने संयुक्त प्रयासों का अभिनंदन होना चाहिए। चिकित्सा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता में इन संस्थानों का विशेष योगदान है। आईसीएमआर से जुड़े शोधकर्ताओं ने टीबी, कॉलेरा, लेप्रोसी, डायरिया, विषाणु जनित बीमारियों के साथ ही एड्स और मलेरिया के रोकथाम पर अभूतपूर्व कार्य किया है। स्वास्थ्य एक ऐसा क्षेत्र है, जो सिर्फ सार्वजनिक और निजी भागीदारी के बिना आगे नहीं बढ़ सकता है। अक्सर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए हम दक्षिण कोरिया से लेकर फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन का उदाहरण देते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं से संपन्न देशों की रैंकिंग में अग्रणी देशों ने बेहतरीन हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर निजी क्षेत्र की सहभागिता की बदौलत ही खड़ा किया है। कुछ ऐसी ही गौरवान्वित करने वाली उपलब्धि कोवीशील्ड वैक्सीन का उत्पादन करने वाली निजी कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से जुड़ी है। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा स्वाइन फ्लू समेत कई घातक बीमारियों के वैक्सीन तैयार करने के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ द्वारा प्रायोजित विभिन्न टीकाकरण कार्यक्रमों में सहयोग करता रहा है। एक्स्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सहयोग से सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा उत्पादित भारतीय वैक्सीन कोवीशील्ड को भी जीवन रक्षा के क्षेत्र में वैश्विक भागीदारी की ही देन माना जा रहा है।

  • वैक्सीन मैत्री की पृष्ठभूमि

यहां वैक्सीन मैत्री को भारत ने किस तरह नया आयाम दिया है, इसे समझने के लिए वैक्सीन डिप्लोमैसी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी समझना होगा। शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी और रूस के वैज्ञानिक आपसी मतभेद भुलाकर पोलियो के उन्मुलन के लिए आगे आए। बताया जाता है कि अमेरिका में पोलियो उन्मुलन के लिए उस वक्त जिस टीके को लगाने की अनुमति दी गई, पहले वह टीका रूस में लाखों बच्चों को वह लगाया जा चुका था।

भारत से प्रवर्तित वैक्सीन डिप्लोमेसी वैश्वीकरण को भी मानव केंद्रित आवरण दे रहा है। यही वजह है कि दक्षिण अमेरिकी देश बोलीविया से लेकर कैरेबियन डोमेनिकल रिपब्लिक जैसे देश भी भारत की वैक्सीन को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसी तरह नेपाल जैसे देश ने राजनीतिक अस्थिरता के बीच भी चीन की वैक्सीन के लिए जिस तरह दरवाजे बंद किए हैं, उससे दोनों देशों के बीच नैसर्गिक प्रगाढ़ता और मजबूत होगी।

  • मुश्किल हालात भी अवसर लेकर आते हैं

इससे पहले भारत ने पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) किट की दुनिया भर में आपूर्ति कर कोरोना की जंग में अपनी वैश्विक प्रतिबद्धता को प्रमाणित किया है। कोरोना महामारी जब शिखर पर थी, उस वक्त देश में 6 करोड़ से अधिक पीपीई किट और 15 करोड़ एन-95 मास्क का उत्पादन सिर्फ आर्थिक हितों के संधान के लिए नहीं किया गया। एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक दिसंबर 2020 तक 2 करोड़ से अधिक पीपीई किट और 4 करोड़ मास्क का निर्यात कर हमने कोरोना की जंग वैश्विक मोर्चे पर आसान बनाया है।

मानवता के संकट के दौरान एक राष्ट्र के रूप में हमारी जीजिविषा को बड़ी-बड़ी आर्थिक महाशक्तियों व विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने देखा। यही वजह है कि चीन के वुहान से निकलकर जैसे ही यह विषाणु दुनिया में फैलकर मौत का तांडव रचने लगा, डब्ल्यूएचओ को भी भारत निर्णायक भूमिका का आह्वान करना पड़ा। कोरोना ने जैसे ही दस्तक दी उसके बाद 11 हजार से अधिक कंपनियां सुरक्षात्मक उपकरणों के विनिर्माण कार्य में जुट गईं। इसी तरह एन-95 मास्क बनाने वाली सैकड़ों कंपनियों और उनमें कार्य करने वाले वाले कोरोना योद्धा ही तो थे।

दरअसल, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में सहयोग के हर उपक्रम को कूटनीतिक चश्मे से देखने की परंपरा रही है। इसके ठीक उलट भारत ने कोरोना की लड़ाई में कूटनीतिक लाभ-हानि के पुराने संदर्भों को पीछे छोड़ते हुए मात्र मानवता की मशाल प्रज्जविलत करने का कार्य किया है। यह कोई पहला अवसर नहीं है, जब वैश्विक संकट के समय भारत ने अगुआ बनकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया हो। आतंकवाद, नस्लवाद, गरीबी, भूखमरी, पर्यावरण संरक्षण समेत अनेक मुद्दों पर हमने अपनी भूमिका सुनिश्चित करते हुए दुनिया को मार्ग दिखाया है। संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना द्वारा प्रवर्तित शांति मिशनों में 18 हजार से अधिक भारतीय सैनिक हिस्सा ले चुके हैं। मौजूदा समय में भी लगभग 7 हजार सैनिक विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय शांति अभियानों में तैनात हैं। इसी तरह पर्यावरण संरक्षण को लेकर पेरिस समझौते के रूप में कार्बन उत्सर्जन में नियंत्रण से जुड़े लक्ष्य तय करने की बात आई तो विकासशील देश होते हुए भी हमने आर्थिक महाशक्तियों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया। पेरिस समझौते पर भारत ने न सिर्फ हस्ताक्षर किया बल्कि आज अक्षय ऊर्जा के स्रोतों के विकास के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ के सहस्त्राब्दी लक्ष्यों के साथ हम कदमताल कर रहे हैं। ऐसे में दुनिया के कोने-कोने में पहुंच रहे भारतीय वैक्सीन को मानवता का ऐसा टीका समझा जाना चाहिए, जो कूटनीति के हर उपायों पर भारी है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि स्वदेशी और विश्व बंधुत्व जैसे भारतीय दर्शन ही वैश्वीकरण को मानव केंद्रित बना सकते हैं।

अरविन्द मिश्रा, स्वदेशी आंदोलन से जुड़े हैं

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